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Modern Homeo Clinic

विशुद्ध होम्योपैथी • अवचेतन पुनर्संरचना • आत्मिक सामंजस्य
Authentic Classical Homeopathy

Blog क्रमांक–5 : हिन्दी

डॉ.सुमित दिंडोरकर – होम्योपैथ एवं काउंसिलर, Modern Homeo Clinic
Dr.Sumit Dindorkar
B.H.M.S.,M.D.

हिन्दी दिवस और वर्तमान परिदृश्य

हिन्दी दिवस की औपचारिक शुभकामनाएँ। मैं इसे औपचारिक ही कहूँगा क्योंकि एक हिन्दी समर्थक और हिन्दी प्रेमी होने के नाते आसपास घटित होने वाले हिन्दी भाषा के नारकीय क्षरण को अनुभव करना ऐसा है मानो अम्ल के पीपे में उँगलियाँ डालने पर उन्हें धीरे-धीरे गलते हुए देखना और असह्य पीड़ा सहना। मध्यप्रदेश हिन्दी भाषी राज्य होने के बाद भी यहाँ के लोगों के मन में हिन्दी को लेकर कोई गर्व नही दिखता। 'अंग्रेज़ी नहीं आती' केवल इसीलिए हिन्दी को घसीटते रहने की अनिवार्य बाध्यता के कारण ही हिन्दी थोड़ी बहुत जीवंत है।

मेरे कुछ मित्र जो कि हिन्दी माध्यम शालाओं में पढ़ें हैं कहते हैं कि मेरे मुखपुस्तक लेख(फेसबुक पोस्ट) में उन्हें जो शुद्ध हिन्दी पढ़ने को मिलती है उससे उनकी साहित्यिक क्षुधा क्षणिक रूप से शमित होती रहती है। मुझे स्मरण है कि हमारे हिन्दी के आचार्यों ने बड़ी लगन और सूक्ष्मता से हमें यह भाषा, इसका व्याकरण और साहित्यिक पक्ष सिखाया है। रस, छंद, अलंकार, शब्द-शक्ति, लोकोक्तियाँ और मुहावरे, संदर्भ, प्रसंग और व्याख्या जैसे कई सुनहरी स्मृतियाँ हमारे स्मृतिपटल पर अजरामर हैं।

भाषाई पतन के उदाहरण

भारतेंदु बाबु हरिश्चन्द्र, रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा आदि अनेक नींव के पत्थरों ने अपना सर्वस्व हिन्दी भाषा के लिए उर्वर भूमि बनाने हेतु दान कर दिया। परंतु आज की नई पीढ़ी के हिन्दी ज्ञान को देखकर बरबस ही हँसी छूट जाती है। उदाहरण के लिए—

"जब और तब"; इस क्रिया-विशेषण का सही उपयोग नही करने की बौनी समझ। एक वाक्य का उदाहरण देखें — "सुबह जब होती है जब सूरज उगता है" तुझे-मुझे के स्थान पर तेको-मेको और हिन्दी लेखन में मात्राओं और व्याकरण की असंख्य त्रुटियाँ इस बात की परिचायक है कि लोगों का हिन्दी शब्दकोश कितना दरिद्र होता जा रहा है। लोगों को अपना नाम तक हिंदी में लिखना नही आता है।

अभी कुछ दिनों पहले ही "विश्वेश्वरैया" जैसे सामान्य शब्द के चक्रवात में फँसे एक राजनेता(?) के सीमित हिन्दी ज्ञान पर मीडिया में बहुत हास्य-विनोद होता रहा। हिन्दी फिल्म जगत की बात करें तो 2 दशकों से इश्क़, नफरत, वफ़ा जैसे अनेक उर्दू पर्यायवाचियों ने मेरी "रूह के परिंदे" को फड़फड़ा कर रखा है। रही-सही कसर आधुनिकवाद के हिन्दी कवियों(?) ने पूर्ण कर दी है। एक प्रयोगवादी हिन्दी कवि की रचना देखें—

"शौच करते समय चप्पल तूने जो पहनी, एक्यूप्रेशर के बिंदुओं से दबाओ बीमारी की टहनी"

हिन्दी के संवर्धन का आह्वान

अस्तु (अर्थात—खैर) उल्टे घड़े पर पानी की तरह ही सही पर मैं आपको हिन्दी में बात करने, लिखने और विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। अपना प्रतिदिन का मुखपुस्तक लेख (फेसबुक-पोस्ट) शुद्ध हिन्दी में लिखने का प्रयास करें, ना कि अग्रेषित (फॉरवर्ड) करें। आने वाली पीढ़ी के वैचारिक उन्नयन के लिए हमें आज ही हिन्दी भाषा की समृद्धि पर कार्य शुरू कर देना चाहिए ताकि भारत पुनः नित नवीन तकनीकों और प्राचीन युक्तियों के संतुलन वाला स्वर्णिम सिंहासन प्राप्त कर सके।

जय हिन्दी।

जय हिन्द।

~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)

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समय

सोमवार से शनिवार: प्रातः 10 से 2 एवं शाम 5 से 9
रविवार: 10 से 2 बजे तक।

फोन

+91 8435784747
+91 7999662723

स्थान

डॉ.सुमित दिंडोरकर
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
टैगोर पार्क के सामने, श्रीराम धर्मशाला के पीछे
खरगोन, मध्यप्रदेश – 451001